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उत्तराखण्ड

हल्द्वानी : पीएचडी उपाधि प्राप्त कर डॉक्टर चंद्र प्रकाश तिवारी ने बढ़ाया क्षेत्र का मान, शोध से खुले औषधीय संभावनाओं के नए द्वार…

पीएचडी उपाधि प्राप्त कर चंद्र प्रकाश तिवारी ने बढ़ाया क्षेत्र का मान, शोध से खुले औषधीय संभावनाओं के नए द्वार

नैनीताल/उत्तराखंड। क्षेत्र के होनहार शोधार्थी डॉ. चंद्र प्रकाश तिवारी ने 20 अप्रैल को अपना अंतिम पीएचडी वाइवा सफलतापूर्वक पूर्ण कर डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी (Ph.D.) की उपाधि प्राप्त की। इस उपलब्धि से परिवार, गुरुजनों एवं पूरे क्षेत्र में खुशी की लहर है।

डॉ. तिवारी के पिता श्री वेद प्रकाश तिवारी (सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य, इंटर कॉलेज) एवं माता श्रीमती रेखा तिवारी (गृहिणी) हैं। उनकी सफलता के पीछे उनके माता-पिता का आशीर्वाद, संस्कार और निरंतर प्रेरणा रही है। इसके साथ ही उनकी पत्नी श्रीमती बबीता तिवारी का विशेष योगदान रहा, जिन्होंने कठिन समय में उनका मनोबल बढ़ाया और हर कदम पर सहयोग दिया।

डॉ. तिवारी ने अपना शोधकार्य “कुमाऊं हिमालय में पाए जाने वाले धनिया (Coriandrum sativum L.) के विभिन्न जीनोटाइप्स में आणविक, रासायनिक एवं जैव-सक्रियता का अध्ययन” विषय पर कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल में पूर्ण किया। यह शोध उन्होंने अपने मार्गदर्शक प्रो. कमल के. पांडे (पूर्व निदेशक, उच्च शिक्षा उत्तराखंड) एवं सह-मार्गदर्शक प्रो. वीना पांडे (विभागाध्यक्ष, बायोटेक्नोलॉजी, कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल) के कुशल निर्देशन में संपन्न किया।

उन्होंने अपने वाइवा के दौरान प्रस्तुति (Presentation) के माध्यम से अपने शोध के महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत किए। उनके अध्ययन में कुमाऊं क्षेत्र के पिथौरागढ़, अल्मोड़ा एवं चंपावत जिलों से एकत्रित धनिया के जीनोटाइप्स का विस्तृत विश्लेषण किया गया, जिसमें आणविक (RAPD मार्कर), रासायनिक (GC-MS) तथा जैव-सक्रियता (एंटी-बैक्टीरियल एवं एंटी-फंगल) का समेकित अध्ययन शामिल था।

शोध के प्रमुख निष्कर्षों में पाया गया कि धनिया के एसेंशियल ऑयल में लिनालूल (Linalool) प्रमुख यौगिक के रूप में उपस्थित है, जो 70% से अधिक मात्रा में पाया गया। यह यौगिक अपनी एंटीमाइक्रोबियल (रोगाणुरोधी) क्षमता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो बैक्टीरिया और फंगस की कोशिका झिल्ली को नष्ट कर उन्हें समाप्त करने में सहायक होता है। इसके अतिरिक्त जेरानिल एसीटेट, अल्फा-पिनीन, कपूर तथा ओलिक एसिड जैसे अन्य महत्वपूर्ण रासायनिक यौगिक भी पाए गए, जो औषधीय गुणों को और अधिक सशक्त बनाते हैं।

रासायनिक विश्लेषण में यह भी सामने आया कि विभिन्न ऊंचाइयों (1500–1900 मीटर) पर पाए जाने वाले जीनोटाइप्स में रासायनिक विविधता काफी अधिक होती है। विशेष रूप से सैंपल C में 93 विभिन्न यौगिक पाए गए, जो इसे सबसे अधिक जैव-सक्रिय एवं औषधीय दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाते हैं।

जैव-सक्रियता अध्ययन में यह सिद्ध हुआ कि धनिया का तेल ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया, विशेषकर Klebsiella pneumoniae के विरुद्ध अत्यधिक प्रभावी है। वहीं, एंटी-फंगल गतिविधि में Candida tropicalis के खिलाफ उत्कृष्ट परिणाम प्राप्त हुए। यह शोध प्राकृतिक औषधियों, फूड प्रिजर्वेटिव्स तथा न्यूट्रास्यूटिकल्स के विकास के लिए नई संभावनाएं प्रस्तुत करता है।

डॉ. तिवारी ने अपनी सफलता का श्रेय अपने आदरणीय मार्गदर्शक प्रो. कमल के. पांडे (पूर्व निदेशक, उच्च शिक्षा उत्तराखंड) को दिया, जिनके मार्गदर्शन, निरंतर प्रेरणा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण ने इस शोध को सफल बनाया। साथ ही उन्होंने सह-मार्गदर्शक प्रो. वीना पांडे (विभागाध्यक्ष, बायोटेक्नोलॉजी, कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल) का भी हृदय से आभार व्यक्त किया, जिनके सुझावों, सहयोग और प्रोत्साहन से शोध कार्य को नई दिशा मिली।

इस उपलब्धि पर क्षेत्र के शिक्षाविदों, परिजनों एवं शुभचिंतकों ने डॉ. तिवारी को शुभकामनाएं देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की है।

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