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उत्तराखण्ड

दिल्ली : जंतर-मंतर पर शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन जारी: प्रदर्शन की दिशा और फोकस पर सवाल : शिवांगनी शर्मा

नई दिल्ली। दिल्ली का जंतर-मंतर लोकतंत्र का वह चौराहा है, जहाँ देश के लगभग हर बड़े मुद्दे की आवाज़ कभी न कभी गूँजी है। इस बार प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और शिक्षा मंत्रालय में जवाबदेही तय करने की है। आंदोलन को लगभग 18–20 दिन हो चुके हैं जबकि प्रदर्शन स्थल पर मौजूद बैनरों के अनुसार, अनशन को 14 दिन पूरे हो चुके हैं।

प्रदर्शन के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक मंच पर मौजूद रहे। उनके साथ अभिषेक दीपके सहित आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अन्य पदाधिकारी भी उपस्थित थे। प्रदर्शन स्थल पर सुरक्षा व्यवस्था के व्यापक इंतजाम किए गए थे और प्रशासन की ओर से आवश्यक प्रबंध किए गए थे।

स्थल पर किए गए अवलोकन के अनुसार, मुख्य मुद्दा परीक्षा प्रणाली और पेपर लीक से जुड़ा होने के बावजूद मंच से कई ऐसे विषय भी उठाए गए जिनका आंदोलन की मूल मांगों से प्रत्यक्ष संबंध स्पष्ट नहीं था। इससे आंदोलन का फोकस बंटता हुआ दिखाई दिया।

पहली नज़र में सब कुछ एक गंभीर और संगठित जनआंदोलन जैसा दिखाई देता है। लेकिन कुछ समय मंच के सामने बैठने के बाद एक अलग तस्वीर उभरने लगी।

मूल मुद्दा था—पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था। मगर मंच पर आते-आते विषयों की सूची इतनी लंबी हो गई कि लगा मानो “ओपन माइक” का कार्यक्रम चल रहा हो। जो भी आया, उसने अपनी समस्या रख दी।

महसूस हुआ कि आंदोलन का सबसे बड़ा विरोधी शायद सरकार नहीं, बल्कि उसका अपना बिखराव है।

दिलचस्प बात यह है कि मंच पर मौजूद लगभग हर वक्ता ईमानदारी से बोल रहा था। समस्या नीयत की नहीं थी। समस्या स्क्रिप्ट की थी।

जब एक मंच पर दस अलग-अलग मुद्दे बराबर समय मांगने लगें, तो यह तय करना कठिन हो जाता है कि आखिर सरकार से बातचीत किस विषय पर की जाए। यदि हर वक्ता अपनी अलग दिशा लेकर आए, तो मुख्य मांग धीरे-धीरे भीड़ में खो सकती है।

अनुमानित तौर पर प्रदर्शन में लगभग 200–250 लोग मौजूद थे। भीड़ थी, ऊर्जा थी, प्रतिबद्ध लोग भी थे, भावनाएँ भी थीं, लेकिन फोकस गायब था।

कभी-कभी आंदोलन को सफल बनाने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ नया नारा नहीं, बल्कि एक ही नारे पर टिके रहना होता है।

सरकारों के लिए सबसे कठिन आंदोलन वे होते हैं जिनकी माँग बिल्कुल स्पष्ट होती है। लेकिन जब एक ही मंच पर दस माँगें खड़ी हो जाएँ, तो सरकार के लिए स्तिथि से पल्ला झाड़ना और यह कहना आसान हो जाता है कि —

“पहले आप तय कर लीजिए कि आपकी माँग क्या है।”

यही वजह है कि यह आंदोलन अपने विरोधियों से कम और अपनी रणनीति से ज़्यादा लड़ रहा था।

माइक लोकतंत्र की सबसे अच्छी चीज़ भी है… और सबसे खतरनाक भी। लोकतंत्र में हर किसी को बोलने का अधिकार है। लेकिन हर आंदोलन का एक उद्देश्य भी होता है।

अगर मंच पर आने वाला हर व्यक्ति अपनी निजी कहानी, अपना राजनीतिक विश्लेषण और अपना अलग एजेंडा जोड़ने लगे, तो आंदोलन धीरे-धीरे जनसुनवाई बन जाता है।

जनसुनवाई अच्छी चीज़ है।

लेकिन जनसुनवाई और जनआंदोलन—दोनों एक जैसी चीज़ नहीं हैं।

यह लेख किसी व्यक्ति या संगठन के विरोध में नहीं है। बल्कि उस विडंबना की ओर इशारा करता है, जहाँ एक मज़बूत मुद्दा अपने ही विस्तार के बोझ तले दबने लगता है।

“अगर हर मुद्दा आपका मुद्दा है, तो अंत में शायद कोई भी मुद्दा आपका नहीं रह जाता।”

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