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उत्तराखण्ड

हल्द्वानी : बजट दिशाहीन, निराशाजनक और जमीनी सच्चाइयों से कटा हुआ : यशपाल आर्य

बजट दिशाहीन, निराशाजनक और जमीनी सच्चाइयों से कटा हुआ : यशपाल आर्य

आज प्रस्तुत राज्य सरकार का बजट पूरी तरह निराशाजनक, दिशाहीन और जमीनी सच्चाइयों से कटा हुआ है। यह बजट केवल आंकड़ों की बाजीगरी और पुराने वादों की पुनरावृत्ति भर है। केंद्रीय सहायतित योजनाओं पर आश्रित इस खोखले बजट में नई सोच, ठोस योजनाओं और दूरदर्शिता का पूर्ण अभाव दिखाई देता है।

यह बजट जनता के साथ एक और छलावा है। युवाओं, किसानों, व्यापारियों, मध्यम वर्ग और गरीब वर्ग—सभी को इस बजट से निराशा ही हाथ लगी है। बजट में कुछ भी नया नहीं है। सरकार ने पुरानी बोतल में नया शरबत परोसने का प्रयास किया है और जादुई आंकड़ों के सहारे विकास का भ्रम पैदा करने की कोशिश की गई है। वास्तविकता यह है कि आगे भी केवल डीपीआर बनाने का खेल चलता रहेगा।

सरकार के वित्तीय कुप्रबंधन का परिणाम है कि आज उत्तराखण्ड पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। प्रदेश पर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज हो चुका है और यह सरकार उत्तराखण्ड के इतिहास में सबसे अधिक कर्ज लेने वाली सरकार साबित हो रही है। वर्ष 2016-17 में जहां राज्य पर लगभग 35 हजार करोड़ रुपये का कर्ज था, वहीं वर्ष 2026 तक यह बढ़कर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है।

राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम (FRBM) के अनुसार कर्ज को राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) के 25 प्रतिशत तक सीमित रखा जाना चाहिए, लेकिन उत्तराखण्ड इस सीमा को वर्ष 2019-20 में ही पार कर चुका है। आए दिन यह खबरें सामने आती रहती हैं कि सरकार को कर्मचारियों के वेतन भुगतान के लिए भी खुले बाजार से कर्ज लेना पड़ रहा है।

डबल इंजन सरकार विकास कार्यों पर बजट खर्च करने में भी असफल साबित हुई है। आंकड़े बताते हैं कि मूल बजट का केवल लगभग 50 प्रतिशत और कुल बजट का मात्र 45 प्रतिशत ही खर्च किया जा सका है। यह स्पष्ट संकेत है कि सरकार के दावे खोखले हैं और उसकी अकर्मण्यता के कारण राज्य के विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं।

प्रदेश में विकास योजनाएं केवल कागजों तक सीमित हैं। सड़कों की हालत खराब है, स्वास्थ्य सेवाएं चरमराई हुई हैं और शिक्षा व्यवस्था में सुधार के दावे अधूरे हैं। किसानों की कर्जमाफी और युवाओं को रोजगार देने जैसी योजनाएं भी या तो अधूरी हैं या फाइलों में दबी हुई हैं।

किसान की आय दोगुनी करने का जो वादा किया गया था, वह आज भी केवल कागजों तक सीमित है। इस बजट में भी किसानों की आय बढ़ाने के लिए कोई ठोस रोडमैप प्रस्तुत नहीं किया गया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य, कृषि यंत्रों से जीएसटी हटाने जैसे महत्वपूर्ण विषयों का उल्लेख तक नहीं किया गया है।

सामाजिक न्याय के मोर्चे पर भी बजट पूरी तरह निराशाजनक है। दलितों, पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों, मध्यम वर्ग और ग्रामीण गरीबों के लिए कोई भी प्रभावी और क्रांतिकारी योजना इस बजट में दिखाई नहीं देती।

स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकार बेहतर सुविधाओं के दावे कर रही है, जबकि वास्तविकता यह है कि प्रदेश के अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों की भारी कमी बनी हुई है। विशेषज्ञ डॉक्टरों के अभाव में मरीजों को मजबूर होकर हायर सेंटर रेफर करना पड़ रहा है।

उद्योग क्षेत्र की स्थिति भी चिंताजनक है। उद्योग विभाग में विकास कार्यों के लिए कैपिटल मद में कोई धनराशि प्रस्तावित नहीं की गई है। जब आधारभूत संरचना के निर्माण के लिए ही बजट प्रावधान नहीं होगा तो राज्य में उद्योग कैसे आएंगे।

गैरसैंण क्षेत्र के विकास को लेकर भी बजट निराशाजनक है। ग्रीष्मकालीन राजधानी क्षेत्र के विकास के लिए घोषित 2500 करोड़ रुपये जारी करने, गैरसैंण को जिला बनाने, केंद्रीय विद्यालय की स्थापना और क्षेत्रीय संस्थानों के विकास जैसे महत्वपूर्ण विषयों का बजट में कोई उल्लेख नहीं किया गया है। इससे स्पष्ट है कि भाजपा सरकार के लिए गैरसैंण इस बार भी “गैर” ही बना हुआ है।

शिक्षा के क्षेत्र में प्राथमिक विद्यालयों को फर्नीचर देने की घोषणा तो की गई है, लेकिन प्रदेश में लगातार बंद हो रहे स्कूलों को बचाने के लिए कोई ठोस योजना प्रस्तुत नहीं की गई है। पॉलीटेक्निक और आईटीआई जैसे तकनीकी संस्थान शिक्षकों और संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं, लेकिन सरकार केवल रैंकिंग की बात कर रही है।

यदि विकास की कसौटी पर इस बजट को परखा जाए तो यह पूरी तरह असफल साबित होता है। राज्य की आर्थिक संसाधन व्यवस्था, ढांचागत विकास और रोजगार सृजन के लिए कोई ठोस खाका इस बजट में प्रस्तुत नहीं किया गया है।

महंगाई से परेशान प्रदेश की जनता को इस बजट से राहत की उम्मीद थी, लेकिन यह बजट जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया है। यह बजट दिशाहीन, संकल्पविहीन, प्रतिगामी और विकास अवरोधी है तथा आम आदमी के हितों के खिलाफ है।

इसलिए यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि माननीय वित्त मंत्री द्वारा प्रस्तुत यह बजट उत्तराखण्ड की जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता और राज्य के लिए अत्यंत निराशाजनक है।

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