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उत्तराखण्ड

हल्द्वानी: शिक्षा में बढ़ती महंगाई पर यशपाल आर्य बोले स्कूल शिक्षा नहीं, कर रहे हैं व्यापार

हल्द्वानी: नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ अभिभावकों पर पड़ रहे आर्थिक बोझ को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि किताबें, ड्रेस और स्टेशनरी की बढ़ती कीमतों ने आम लोगों की कमर तोड़ दी है। हर साल नए सत्र में निजी स्कूल अभिभावकों पर महंगे पब्लिशर्स की किताबें और तय दुकानों से ड्रेस खरीदने का दबाव बनाते हैं। इससे किताबों में कमीशनखोरी का खेल चलता है, जबकि शिक्षा विभाग मूकदर्शक बना बैठा है।नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि स्कूल प्रबंधक जानबूझकर हर दो-तीन साल में किताबें और प्रकाशक बदल देते हैं ताकि छात्र पुराने सत्र की किताबें उपयोग न कर सकें और अभिभावक हर बार नई किताबें खरीदने को मजबूर हो जाएं। इससे स्पष्ट होता है कि यह सब बच्चों के हित में नहीं, बल्कि मुनाफे के लिए किया जाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकारी स्कूलों में वही किताबें सस्ती दरों पर मिलती हैं, तो प्राइवेट स्कूलों में उन्हें महंगे दामों पर क्यों बेचा जा रहा है? निजी स्कूलों द्वारा डेवेलपमेंट फीस, एक्टिविटी फीस और अन्य मदों में की जा रही वसूली ने शिक्षा को कारोबार बना दिया है। बच्चों को जैसे “ATM मशीन” मान लिया गया है।आर्य ने यह भी कहा कि सरकारी स्कूलों की हालत खराब है—वहां शिक्षकों की भारी कमी है, जिससे गरीब अभिभावकों को मजबूरन प्राइवेट स्कूल का रुख करना पड़ता है। शिक्षा अब सेवा नहीं, व्यापार बन चुकी है। सरकार चुप बैठी है और लूट पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही। नेता प्रतिपक्ष ने सरकार से मांग की कि शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाए। किताबों और ड्रेस की बिक्री में पारदर्शिता लाई जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि हर बच्चे को सस्ती, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले। उन्होंने कहा कि स्कूलों का मकसद सिर्फ पढ़ाई होना चाहिए, कारोबार नहीं।

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