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आध्यात्मिक

जानिये सातों व आठों का पर्व की मान्यता और मानने की विधि…

आज पंचशील कॉलोनी और सर्वोदय बिहार पीलीकोठी की महिलाओं ने सातों-आठों व्रत की पूजा की। इस दौरान महिलाओं ने धूमधाम से यह पर्व मनाया। उत्तराखंड में हर साल सातों व आठों का पर्व मनाया जाता है। इस पर्व की शुरुआत भाद्रपद मास में अगस्त-सितंबर की पंचमी तिथि से होती है। कई जगह इसे बिरूड पंचमी भी कहते हैं। हर घर में तांबे के एक बर्तन में पांच अनाजों जिसमें मक्का, गेहूं, गहत ग्रुस व कलू को भिगाकर मंदिर के समीप रखा जाता है। ये अनाज औषधीय गुणों से भी भरपूर होते हैं। साथ ही स्वास्थ्य के लिए भी अति लाभप्रद होते हैं। इस मौसम में इन अनाजों को खाना अति उत्तम माना जाता है। इसीलिए इस मौके पर इन्हीं अनाजों को प्रसाद के रूप में बांटा एवं खाया जाता है।

देवभूमि में एक ऐसा अनोखा पर्व जिसे सातों व आठों का पर्व भी कहते हैं। इंसान भगवान को भी एक मानवीय रिश्ते बड़ी दीदी और जीजाजी के रूप मेंमें बड़ी आस्था व विश्वास के साथ बांध देता है। हालांकि यह पूरे उत्तराखंड में मनाया जाता है लेकिन खासकर पिथौरागढ़ जिले में यह बड़े धूमधाम व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इसके पीछे कई मान्यताएं है। माना जाता है कि भगवान भोलेनाथ का निवास स्थान व उनकी ससुराल देवभूमि में है। इसीलिए यह देवभूमि भगवान भोलेनाथ को समर्पित है। माता पार्वती को बड़ी दीदी व भगवान भोलेनाथ को जवाई राजा के रूप में सम्मान दिया जाता है। जिसमें उनकी पूजा आराधना की जाती है।

जब किसी परिवार की बेटी शादी के बाद जब अपने पति के साथ पहली बार मायके आती है तो उस समय परिवार के लोगों के मन में उत्साह और उमंग रहता है। ऐसे में जमाई राजा को जो स्नेह और सम्मान दिया जाता है। उसी प्रकार का आदर, सम्मान व स्नेह भोलेनाथ को भी दिया जाता है। उनको अपने परिवार का एक सदस्य ही माना जाता है।

इस पर्व के अंतर्गत दो दिन बाद सप्तमी के दिन शादीशुदा महिलाएं पूरे दिन व्रत रखती हैं। इसके बाद दोपहर में अपना पूरा सोलह श्रृंगार कर धान के हरे भरे खेतों में निकल पड़ती हैं। धान के पौधे को महिलाएं उखाड़ लेती हैं। इन्हीं पौधों से माता पार्वती की एक आकृति बनाई जाती है। फिर उस आकृति को एक डलिया में थोड़ी सी मिट्टी के बीच में स्थापित कर दिया जाता है। उसे नए वस्त्र व आभूषण पहनाये जाते हैं। पौधों से बनी इस आकृति को गमरा या माता गौरी का नाम दिया जाता है। माता गौरी का सोलर श्रृंगार किया जाता है। उसके बाद महिलाएं गमरा सहित डलिया को सिर पर रखकर लोकगीत गाते हुए गांव में वापस आती हैं। माता गौरी को गांव के ही किसी एक व्यक्ति के घर पर पंडित जी द्वारा स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है।

इसके बाद पंचमी के दिन भिगोये गए पांचों अनाजों के बर्तन को नौले जो अक्सर पहाड़ों में पानी भरने की जगह होती है। वहां दउन अनाजों को पानी से धोया जाता है। इन्हीं बिरूडों से माता गौरी की पूजा-अर्चना की जाती है। इस अवसर पर शादीशुदा सुहागिन महिलाएं गले व हाथ में पीला धागा बांधती हैं। माना जाता है कि यह अखंड सुख-सौभाग्य व संतान की लंबी आयु की मंगल कामना के लिए बांधा जाता है।

माना जाता है कि माता गौरी भगवान भोलेनाथ से रूठ कर अपने मायके चली आती है। फिर अगले दिन अष्टमी को भगवान भोलेनाथ माता पार्वती को मनाने उनके मायके चले आते हैं। इसीलिए अगले दिन महिलाएं फिर से सज धज कर धान के हरे भरे खेतों में पहुंचती हैं। वहां से सौं और धान के कुछ पौधे उखाडक़र उनको एक पुरुष की आकृति में ढाल दिया जाता है। उन्हें महेश्वर बोला जाता है। इस पर्व पर घर की बुजुर्ग महिलाएं घर के सभी सदस्यों के सिर पर इन विरूडों को रखकर उनको ढेर सारा आशीर्वाद देते हुए उनकी लंबी आयु व सुखमय जीवन की मनोकामना करती है।

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