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उत्तराखण्ड

देहरादून : जनजाति क्षेत्र चकराता में क्या मुस्लिम और नेपाली वोट भी है मतदाता सूची में?


उत्तराखंड में मतदाता सूची के पुनर्निरीक्षण का काम यानी SIR फरवरी में शुरू होने जा रहा है। अभी राज्य भर में बीएलओ सर्वे कर रहे है और ऐसे वोटर्स की पहचान कर रहे है जिनके नाम दो या तीन मतदाता सूचियों में दर्ज है और इन्हें एक मतदाता सूची में लाने के लिए वोटर्स से पूछा जा रहा है कि सही में क्या है ?
इन्हीं सर्वे के बीच एक चौंकाने वाले विषय भी सामने आए है कि यहां चकराता जनजाति रिजर्व सीट पर पिछले पर पिछले कुछ सालों में मुस्लिम वन गुर्जरों के नाम मतदाता सूची में दर्ज हुए है जिनको लेकर स्थानीय जन मानस में भी आक्रोश देखा गया है।
अभी ताज़ा जानकारी ये भी सामने आई है कि चकराता क्षेत्र में ही बड़ी संख्या में नेपाल देश के लोगों के भी नाम वोटर लिस्ट में देखे गए है ये नाम यहां कैसे चढ़ाए गए? ये व्यापक जांच का विषय बन गया है।
बताया जाता है कि नेपाली मूल के लोगों के चकराता ही नहीं बल्कि अन्य विधान सभाओं क्षेत्रों की मतदाता सूचियों में दर्ज हो रखे है।
नेपाल मूल के वोटर्स के नाम ज्यादातर उत्तराखंड की जातियों से मेल खाते है। कार्की, जोशी, सामंत, भट्ट, देउपा आदि जाति नेपाल में भी है और उत्तराखंड के पहाड़ों में भी हैं।
चकराता क्षेत्र में बड़ी संख्या में पावर प्रोजेक्ट्स और जंगलात के कामों के लिए नेपाली श्रमिक उत्तराखंड आ कर यहां प्रवास करने लगे ,बताया जाता है ठेकदारों ने उनके आधार कार्ड बनवा लिए और उनके नाम वोटर लिस्ट में भी दर्ज करवा दिए।
जानकारी के मुताबिक चकराता क्षेत्र में
चात्रा,हनोल,कथियान ,कोटी कनासर,
मशक ,चौंसाल ,बिरनाड़ ,बास्तील, ओबरासेर के गांवों में नेपाली मूल के लोगों के नाम वोटर लिस्ट में दर्ज है जिनकी जांच पड़ताल चल रही है,इसके अलावा सबसे ज़्यादा नेपाली श्रमिक त्यूनी क्षेत्र में हैं जिनकी संख्या करीब 1400 बताई जाती है।
उल्लेखनीय है कि त्यूणी क्षेत्र की वोटर लिस्ट में दो हजार से अधिक मुस्लिम वन गुर्जरों के नाम दर्ज है जोकि खाना बदोश माने जाते है।
उत्तराखंड के जनजाति जौनसारी बावर के स्थानीय लोग इन वोटर्स को घुसपैठिए मानते है और उन्हें यहां से हटाने की मांग करते रहे है इसके पीछे उनका तर्क ये रहा है कि ये जनजाति आरक्षित क्षेत्र है जहां बाहरी लोगों को बसना या उनके द्वारा जमीन खरीदना मना है ये वन गुर्जर जंगलों में सरकारी वन भूमि पर अवैध कब्जे करके बैठे हुए है और जनजातियों के अधिकारों पर दावे कर रहे हैं ।
त्यूणी , हिमाचल से लगा हुआ संवेदनशील कस्बा है। हिमाचल में भी बाहरी लोग भूमि नहीं खरीद सकते वहां के भू कानून बेहद सख्त है।
त्यूणी में रुद्र सेना के संयोजक राकेश तोमर उत्तराखंडी कहते है कि राजनीतिक संरक्षण और वन विभाग की लापरवाह नीतियों के चलते जौनसारी जनजाति का वजूद खतरे में है इनको यहां से जाना भी होगा और इन्हें वहां वोट डालना चाहिए जहां यूपी से ये आए है।

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