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उत्तराखण्ड

देहरादून: सीता देवी केस बना मिसाल, पंचायत चुनावों में न्याय की उम्मीद जगी: यशपाल आर्य

देहरादून: नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने कहा कि पंचायत चुनावों में निर्वाचन अधिकारियों द्वारा लिए गए बेतुके और मनमाने फैसलों को उच्च न्यायालय नैनीताल और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खारिज किए जाने से आम जनता में न्याय की उम्मीद जगी है। उन्होंने कहा कि यह सिलसिला हाल ही में टिहरी जिले की सकलाना क्षेत्र की भूत्शी पंचायत से सीता देवी के नामांकन को लेकर सामने आया है।आर्य ने बताया कि पहले नैनीताल उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने सीता देवी का नामांकन अस्वीकार करने के निर्वाचन अधिकारी के फैसले को गलत करार दिया था। अब इस निर्णय को देश की सर्वोच्च अदालत ने भी सही ठहराया है। इससे स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका आम नागरिक के अधिकारों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है।यशपाल आर्य ने कहा कि चुनावी याचिकाओं के इतिहास में यह फैसला मील का पत्थर साबित होगा। यह भविष्य में होने वाले चुनाव संबंधी विवादों में देशभर की अदालतों के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करेगा।उन्होंने कहा कि आमतौर पर एक बार चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद न्यायालय 1952 के पुन्नू स्वामी बनाम भारत सरकार केस का हवाला देते हुए चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करते हैं। लेकिन जब रिटर्निंग अधिकारी सरकार के इशारे पर आयोग के नियमों की अनदेखी कर किसी प्रत्याशी को लाभ पहुंचाने के लिए मनमाना निर्णय लेते हैं, तो ऐसे मामलों में अदालतें हस्तक्षेप कर सकती हैं।आर्य ने उदाहरण देते हुए कहा कि हाल के उत्तराखंड पंचायत चुनावों में ऐसे दर्जनों मामले सामने आए हैं, जहां निर्वाचन अधिकारियों ने पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2000 में दिए गए निर्वाचन आयोग बनाम अशोक कुमार मामले के फैसले के अनुसार, यदि किसी निर्वाचन अधिकारी की कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण, मनमानी या अवैध है, तो उस पर रिट याचिका के माध्यम से अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि आज भी अधिकतर अदालतें चुनावी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करतीं, और जब तक निर्णय आता है, तब तक चुनाव समाप्त हो चुके होते हैं। इससे चुनावी गड़बड़ियों में लिप्त प्रत्याशियों और अधिकारियों को बढ़ावा मिलता है।अंत में उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि पुन्नू स्वामी मामले की आड़ में लाभ उठाने वालों को न्यायालयों में चुनौती दी जाए, ताकि लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हो सकें।

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